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    सुदीप सिंह शिवसेना में शामिल, बिहार के महासचिव बने; संगठन और आगामी चुनावों पर रहेगा फोकस

    ​लगभग 30 वर्षों तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़े रहे और शिवसेना के लंबे समय से प्रशंसक व शुभचिंतक रहे श्री सुदीप प्रताप सिंह को शिवसेना का महासचिव बिहार नियुक्त किया गया है।

    ​पार्टी ने उन्हें पूरे बिहार में शिवसेना के संगठनात्मक ढांचे को स्थापित करने, मजबूत करने और विस्तार करने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी है।

    ​शिवसेना एनडीए गठबंधन व चुनाव के मुख्य राष्ट्रीय समन्वयक डॉ. अभिषेक वर्मा ने सुदीप जी का शिवसेना परिवार में गर्मजोशी से स्वागत किया। पटना में आयोजित इस मिलन समारोह के दौरान पढ़े गए अपने रिकॉर्डेड संदेश में डॉ. वर्मा ने कहा, “श्री सुदीप प्रताप सिंह शिवसेना में शामिल हुए हैं। यह उनके संगठनात्मक और सामाजिक कार्यों के लंबे अनुभव की एक नई पारी की शुरुआत है। अपने स्कूली दिनों से ही वे आरएसएस से जुड़ गए थे और शाखाओं के संगठन में भूमिका निभाई। 90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन और बिहार के गांवों में सामाजिक-संगठनात्मक कार्यों में भी उनकी सक्रिय भागीदारी रही।”

    ​इस अवसर पर बिहार और यूपी शिवसेना के अध्यक्ष क्रमशः आशुतोष झा और अभय द्विवेदी भी मौजूद रहे। इसके अलावा मिथलेश कुमार राय और कुणाल यादव जैसे स्थानीय नेता भी इस भव्य समारोह में शामिल हुए।

    ​सुदीप प्रताप सिंह: पृष्ठभूमि और सफर

    * ​सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव: एक मिशनरी स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद भारत की महान सांस्कृतिक विरासत के प्रति उनका गहरा लगाव रहा। स्कूली दिनों में ही वे आरएसएस से जुड़े, ‘मुख्य शिक्षक’ बने और पारिवारिक रूप से अनुकूल माहौल न होने के बावजूद पटना में संघ की शाखाओं का आक्रामक रूप से विस्तार किया।

    * ​शुरुआती दौर में शिवसेना से जुड़ाव: स्कूली दिनों के दौरान ही वे शिवसेना के विचारों से प्रभावित हुए और पटना में इसे स्थापित करने में योगदान दिया। उस दौर में लैंडलाइन फोन दुर्लभ हुआ करते थे; ऐसे में उनके घर के फोन का इस्तेमाल पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं से संपर्क साधने के लिए किया जाता था।

    * ​राम जन्मभूमि आंदोलन में भागीदारी: 90 के दशक में राम जन्मभूमि आंदोलन से प्रेरित होकर वे कई युवाओं को साथ लेकर ‘कारसेवा’ के लिए अयोध्या चले गए थे। 10 दिनों बाद जब लौटे, तो उन्हें पिता की नाराजगी का सामना करना पड़ा, लेकिन उन्होंने आरएसएस और सामाजिक गतिविधियों से अपना नाता बनाए रखा।

    * ​कॉर्पोरेट सफर और सामाजिक कार्य: स्नातक के बाद उन्होंने देश के एक प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थान से एमबीए किया और मुंबई की एक नामी एफएमसीजी (FMCG) कंपनी में कैंपस प्लेसमेंट हासिल किया। मुंबई में उन्हें कॉर्पोरेट संस्कृति के साथ-साथ आरएसएस और शिवसेना की कार्यशैली को उसकी जन्मभूमि में करीब से देखने का मौका मिला। 17 वर्षों के सफल कॉर्पोरेट करियर में उन्होंने बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) सहित कई बड़ी कंपनियों में एचआर प्रमुख (HR Head) के रूप में काम किया। इस दौरान अपने खाली समय में उन्होंने चेन्नई, दिल्ली और नोएडा जैसे बड़े शहरों में संघ के कार्य को आगे बढ़ाया।

    * ​मातृभूमि की ओर वापसी: 2014, 2019 और 2024 के लोकसभा चुनावों में उन्होंने भाजपा के चुनाव प्रचार में सक्रिय रूप से भाग लिया। इसी दौरान उन्होंने अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनी और पूर्ण रूप से सामाजिक व राजनीतिक जीवन में समर्पित होने का फैसला किया। उन्होंने कॉर्पोरेट जगत छोड़ बिहार के सहरसा जिले स्थित अपने पैतृक गांव लौटने का एक कठिन और साहसिक फैसला लिया।

    * ​चुनौतियों का सामना और जनसेवा: गांव लौटने पर उन्हें कई तरह की चुनौतियों और स्थानीय आपराधिक तत्वों की धमकियों का सामना करना पड़ा, जो 90 के दशक की अव्यवस्था की याद दिलाते थे। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद, उन्होंने बिहार में संघ के साथ पूर्णकालिक काम शुरू किया और जिला स्तरीय बैठकों व विस्तार का निरीक्षण किया।

    * ​ज़मीनी स्तर पर मजबूत पकड़: ‘राम जन्मभूमि निधि समर्पण’ अभियान के दौरान उन्होंने सहरसा के लगभग 50% गांवों का व्यक्तिगत दौरा किया। इस अनुभव ने उन्हें बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों की ज़मीनी समस्याओं को गहराई से समझने में मदद की।

    ​जनकल्याणकारी पहल: वे पिछले कई वर्षों से अपने स्वर्गीय पिता की स्मृति में गांवों में मुफ्त मोतियाबिंद ऑपरेशन कैंप का आयोजन भी लगातार कर रहे हैं

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